MMRDA का बड़ा कदम: लैंड टोकनाइजेशन से इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग, PAP सेल्स में दलालों पर रोक
मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA) दो बड़े कदमों के जरिए अपने कामकाज में पारदर्शिता और नई फंडिंग व्यवस्था लाने की तैयारी में है। एक तरफ प्राधिकरण महाराष्ट्र के प्रस्तावित “डेल्टा एक्ट” के तहत लैंड टोकनाइजेशन के जरिए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए नया फंडिंग मॉडल तलाश रहा है, तो दूसरी तरफ प्रोजेक्ट अफेक्टेड पर्सन (PAP) सेल्स में दलालों और बिचौलियों के दखल को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए गए हैं।
लैंड टोकनाइजेशन है क्या
लैंड टोकनाइजेशन एक नया फाइनेंशियल मॉडल है जिसमें जमीन की संपत्ति को डिजिटल टोकन में बदला जाता है, ताकि उसकी वैल्यू को ज्यादा लचीले तरीके से इस्तेमाल किया जा सके। MMRDA के कमिश्नर डॉ. संजय मुखर्जी के मुताबिक इस तरीके से प्राधिकरण किसी खास प्रोजेक्ट के लिए जरूरत के हिसाब से ही जमीन की वैल्यू का इस्तेमाल कर सकेगा, न कि हर बार जमीन को पूरी तरह बेचना पड़ेगा। महाराष्ट्र इस प्रस्तावित डेल्टा एक्ट के जरिए देश का पहला “टोकनाइज्ड स्टेट” बनने की तैयारी में है।
MMRDA के प्रोजेक्ट्स और आंकड़े
MMRDA के पास तीन जिलों में कुल 33,954.61 हेक्टेयर जमीन है, और वित्त वर्ष 2026-27 के लिए प्राधिकरण ने जमीन से जुड़े राजस्व का लक्ष्य 11,177 करोड़ रुपये रखा है। इसमें बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (BKC) से 5,534.95 करोड़ रुपये, वडाला ट्रक टर्मिनल व नोटिफाइड एरिया से 1,630 करोड़ रुपये, और कर्नाला-साई-चिरनेर न्यू टाउन डेवलपमेंट से 4,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य है। यह आंकड़े परंपरागत जमीन मोनेटाइजेशन के हैं — टोकनाइजेशन लागू होने पर यह प्राधिकरण के लिए फंडिंग का एक अतिरिक्त और तेज जरिया बन सकता है।
PAP सेल्स में सुधार
दूसरी तरफ MMRDA ने प्रोजेक्ट अफेक्टेड पर्सन (PAP) यानी पुनर्वास से जुड़े कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित PAP दफ्तरों में अब अनऑथराइज्ड ब्रोकर और एजेंटों की एंट्री पूरी तरह बैन कर दी गई है, और स्टाफ को साफ चेतावनी दी गई है कि नियमों का उल्लंघन करने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी। इसके अलावा पुनर्वास से जुड़े मामलों में बिचौलियों के प्रभाव को रोकने के लिए PAP सेल्स में CCTV कैमरे और वॉयस रिकॉर्डिंग सिस्टम भी लगाए जा रहे हैं।
क्यों जरूरी है यह कदम
पुनर्वास से जुड़े मामलों में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि असली प्रोजेक्ट अफेक्टेड परिवारों को अपने हक के लिए दलालों या बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता है, जिसकी वजह से भ्रष्टाचार और देरी दोनों बढ़ जाती है। CCTV, वॉयस रिकॉर्डिंग और ब्रोकर-बैन जैसे कदमों से उम्मीद है कि पुनर्वास प्रक्रिया ज्यादा सीधी, तेज और जवाबदेह बनेगी। वहीं लैंड टोकनाइजेशन का प्रयोग सफल रहा तो यह मॉडल आगे चलकर देश के दूसरे शहरी विकास प्राधिकरणों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जो जमीन जैसी बड़ी संपत्तियों को बिना पूरी तरह बेचे इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए फंड जुटाने का एक नया रास्ता तलाश रहे हैं।


