इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में भारत की चीन पर भारी निर्भरता: 71 प्रोडक्ट लाइनों में 80% से ज्यादा आयात
एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिकल मशीनरी के 71 प्रोडक्ट लाइनों में अब भी चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर है। वित्त वर्ष 2025-26 में इन उत्पाद श्रेणियों में भारत के कुल आयात का कम से कम 80% हिस्सा अकेले चीन से आया, जिससे मेक इन इंडिया और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिशों पर सवाल खड़े होते हैं।
किन उत्पादों में सबसे ज्यादा निर्भरता
यह निर्भरता HS चैप्टर 85 यानी इलेक्ट्रिकल मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की श्रेणी में सबसे ज्यादा देखी गई है — जिसमें मोटर्स, केबल्स, स्विचिंग इक्विपमेंट, लिथियम-आयन बैटरी और सेमीकंडक्टर्स जैसे कंपोनेंट्स शामिल हैं। यह वही पुर्जे हैं जो टेलिकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल मशीनरी में इस्तेमाल होते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक कई तारीफ लाइनों में चीन की हिस्सेदारी 90 से 99% के बीच है, जो दिखाता है कि भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में चीनी सोर्सिंग कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुकी है। खासतौर पर लिथियम-आयन बैटरी में चीन की हिस्सेदारी 83.6% और सेमीकंडक्टर्स में 48.9% दर्ज की गई है।
व्यापार घाटे का बड़ा आंकड़ा
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 112.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें अकेले इलेक्ट्रिकल मशीनरी की हिस्सेदारी 43.1 अरब डॉलर यानी करीब 38% रही। लिथियम-आयन बैटरी का आयात 2021-22 के बाद से दोगुने से भी ज्यादा बढ़ चुका है, जिससे भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी सेक्टर के लिए यह एक रणनीतिक निर्भरता बन गई है।
यह समस्या अस्थायी नहीं, ढांचागत है
रिपोर्ट में सबसे अहम बात यह कही गई है कि यह निर्भरता “साइक्लिकल नहीं बल्कि स्ट्रक्चरल” है, यानी सिर्फ घरेलू असेंबलिंग बढ़ाने से यह समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। भारत में भले ही मोबाइल फोन और कुछ इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की असेंबलिंग तेजी से बढ़ी है, लेकिन उनके अंदर लगने वाले बुनियादी पुर्जे और कच्चा माल अब भी बड़े पैमाने पर चीन से ही आ रहे हैं।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्भरता को कम करने के लिए भारत को सेमीकंडक्टर और बैटरी सेल मैन्युफैक्चरिंग में गहरे और दीर्घकालिक निवेश की जरूरत है, न कि सिर्फ असेंबलिंग लेवल पर प्रोत्साहन देने की। सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं और सेमीकॉन इंडिया मिशन जैसी पहलें इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन कोर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग की पूरी सप्लाई चेन खड़ी करने में अभी कई साल लग सकते हैं। इस बीच MSME और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स के लिए जरूरी है कि वे अपनी सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करें और वियतनाम, ताइवान जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर भी विचार करें, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता से जुड़े जोखिम को कम किया जा सके।


