जेट एयरवेज केस: मुंबई NCLT ने लिक्विडेटर की Boeing रिफंड याचिका खारिज की
बंद हो चुकी एयरलाइन जेट एयरवेज से जुड़े मामले में मुंबई की नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने एक अहम फैसला सुनाया है। ट्रिब्यूनल ने कंपनी के लिक्विडेटर की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें विमान निर्माता कंपनी Boeing से करीब 92.12 मिलियन डॉलर की एडवांस राशि वापस दिलाने की मांग की गई थी।
मामला क्या है
जेट एयरवेज ने अपने परिचालन के दौरान Boeing को नए विमानों की डिलीवरी के लिए एडवांस पेमेंट किया था। लेकिन 2019 में एयरलाइन का परिचालन बंद हो गया और बाद में कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में चली गई। कंपनी के लिक्विडेटर ने दावा किया कि चूंकि विमानों की डिलीवरी कभी नहीं हुई, इसलिए Boeing को यह एडवांस राशि लौटानी चाहिए। लेकिन NCLT ने इस याचिका को स्वीकार नहीं किया।
NCLT का रुख
ट्रिब्यूनल के इस फैसले का मतलब है कि जेट एयरवेज के लिक्विडेशन एस्टेट को फिलहाल Boeing से यह बड़ी रकम वापस मिलने की उम्मीद टूट गई है। जेट एयरवेज का दिवालिया मामला वर्षों से भारत के सबसे जटिल कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी मामलों में गिना जाता रहा है, जिसमें हजारों करोड़ रुपये के दावे, हजारों कर्मचारियों की बकाया सैलरी और कई घरेलू व विदेशी लेनदार शामिल हैं।
क्यों अहम है यह फैसला
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जेट एयरवेज के लिक्विडेशन एस्टेट के पास उपलब्ध फंड सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करता है कि कंपनी अलग-अलग पक्षों से कितनी रिकवरी कर पाती है। Boeing जैसी बड़ी वैश्विक कंपनी से मिलने वाली यह रकम लिक्विडेशन एस्टेट के लिए एक बड़ी उम्मीद थी, जिसे अब झटका लगा है। हालांकि इस फैसले के खिलाफ आगे अपीलीय प्रक्रिया की गुंजाइश बनी रहती है, और लिक्विडेटर की ओर से इस आदेश को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी जा सकती है।
एविएशन सेक्टर के लिए सबक
जेट एयरवेज का मामला भारतीय एविएशन इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा सबक रहा है — यह दिखाता है कि कैसे एक समय की देश की सबसे बड़ी प्राइवेट एयरलाइनों में गिनी जाने वाली कंपनी भी वित्तीय दबाव, बढ़ते कर्ज और खराब प्रबंधन की वजह से पूरी तरह बंद हो सकती है। इस केस से जुड़े कर्मचारी, लेनदार और निवेशक अब भी अंतिम निपटारे का इंतजार कर रहे हैं, और हर नया ट्रिब्यूनल आदेश इस बहुप्रतीक्षित मामले के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रहा है।
अब आगे क्या
कानूनी जानकारों के मुताबिक इस तरह के हाई-वैल्यू इंटरनेशनल क्लेम में अक्सर कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों, फोर्स-मेज्योर क्लॉज और अलग-अलग देशों के कानूनों के टकराव जैसी जटिलताएं आड़े आती हैं, जिसकी वजह से रिकवरी में लंबा वक्त लग जाता है। जेट एयरवेज के मामले में लिक्विडेटर अब यह तय करेगा कि इस आदेश को अपील में चुनौती दी जाए या किसी दूसरे रास्ते से रिकवरी की कोशिश की जाए। तब तक कंपनी के कर्जदाताओं और पूर्व कर्मचारियों को अपने बकाया भुगतान के लिए इंतजार जारी रखना होगा।


