शेयर बाजार में गिरावट: ईरान-अमेरिका तनाव से सेंसेक्स-निफ्टी टूटे, जानें वजह
घरेलू शेयर बाजार में सोमवार, 1 सितंबर 2026 को लगातार दूसरे दिन गिरावट दर्ज की गई। बीएसई सेंसेक्स 12.99 अंक यानी 0.02 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 76,944.28 अंक पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50, 24.60 अंक यानी 0.10 प्रतिशत टूटकर 24,055.80 अंक पर आ गया। निफ्टी मिडकैप इंडेक्स में 1.39 प्रतिशत और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.23 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।
क्यों टूटा बाजार
बाजार में इस गिरावट की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव बताया जा रहा है। इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख ने भी निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। इन वैश्विक चिंताओं के चलते हेल्थकेयर, ऑटो, रियल्टी और फार्मा सेक्टर के शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली देखी गई, जबकि एफएमसीजी और आईटी शेयरों में निवेशकों ने सुरक्षित निवेश के तौर पर खरीदारी की।
सबसे ज्यादा नुकसान किन शेयरों में
निफ्टी 50 में सबसे ज्यादा नुकसान श्रीराम फाइनेंस, मारुति सुजुकी इंडिया और इंटरग्लोब एविएशन के शेयरों में देखा गया। इसी बीच प्राथमिक बाजार में भी हलचल रही। सिंबायोटेक फार्मालैब का शेयर इश्यू प्राइस पर लिस्ट हुआ, जबकि मिल्की मिस्ट का शेयर अपने इश्यू प्राइस से करीब 9.5 प्रतिशत प्रीमियम के साथ लिस्ट हुआ।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख
तकनीकी विश्लेषकों के मुताबिक, निफ्टी के लिए 24,000-23,950 का स्तर अहम सपोर्ट जोन है। अगर बाजार इस स्तर से नीचे टूटता है तो निफ्टी 23,800 तक फिसल सकता है, वहीं 24,170-24,200 का स्तर तत्काल रेजिस्टेंस के तौर पर काम कर सकता है।
तनाव बढ़ने का कारण
ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव और कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचाई, जिसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा। जब भी मध्य-पूर्व क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, तो निवेशकों को कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की आशंका सताने लगती है, जिससे तेल की कीमतें बढ़ती हैं और भारत जैसे तेल आयातक देश की अर्थव्यवस्था पर दबाव बनता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से भारत के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) और मुद्रास्फीति पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात के जरिए पूरा करता है। इसके अलावा रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है, जिससे आयात महंगा हो सकता है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) ऐसी अनिश्चितता के दौर में जोखिम से बचने के लिए अपनी पूंजी सुरक्षित बाजारों में स्थानांतरित करते हैं, जिससे भारतीय बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ जाता है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव आमतौर पर अल्पकालिक होते हैं और लंबी अवधि में बाजार अपनी मूल दिशा में वापस आ जाता है। ऐसे समय में घबराकर शेयर बेचने के बजाय, निवेशकों को कंपनियों के मूल सिद्धांतों (fundamentals) और अपने दीर्घकालिक निवेश लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी जाती है। सोना जैसी सुरक्षित संपत्तियों में विविधीकरण (diversification) भी ऐसे समय में जोखिम कम करने में मदद कर सकता है।
ऐतिहासिक तुलना
इससे पहले भी विभिन्न भू-राजनीतिक संकटों के दौरान भारतीय बाजार में समान गिरावट देखी गई है, लेकिन हर बार बाजार ने कुछ महीनों के भीतर रिकवरी दर्ज की है। इतिहास बताता है कि दीर्घकालिक निवेशकों के लिए ऐसी अस्थायी गिरावट अक्सर बेहतर कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण शेयर खरीदने का अवसर भी बन जाती है।


