RBI ने स्पष्ट किए विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व (FERR) नियम: 20% रिजर्व, 2 मिलियन डॉलर की सीमा
भारतीय रिजर्व बैंक ने 16 अक्टूबर 2026 को अधिकृत डीलर बैंकों के लिए विदेशी मुद्रा जोखिम रिजर्व (FERR) संबंधी नियम स्पष्ट किए। सीए क्लब इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार स्पष्टीकरण में फॉरेक्स डेरिवेटिव, 20% रिजर्व की आवश्यकता, 2 मिलियन डॉलर की सीमा, छूट और रिपोर्टिंग की समयसीमा शामिल है।
यह ऋण नियम नहीं है
रिपोर्ट के अनुसार यह विदेशी मुद्रा विनियमन है, कर्ज देने का सीधा नियम नहीं। इसका असर मुख्यतः बैंकों के फॉरेक्स डेरिवेटिव कारोबार पर होगा, पर आयात-निर्यात करने वाले व्यवसायी हेजिंग की लागत में बदलाव की संभावना के लिए अपने बैंक से जानकारी ले सकते हैं।
आयात-निर्यात इकाइयों के लिए
रुपये में उतार-चढ़ाव के दौर में, जैसा कि हाल के दिनों में दिखा, निर्यातक और आयातक अपने फॉरेक्स कॉन्ट्रैक्ट और हेजिंग रणनीति की समीक्षा बैंक के साथ कर सकते हैं।
नियम का पूरा पाठ RBI की वेबसाइट पर उपलब्ध परिपत्र में देखें।
FERR क्या है
फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) बैंकिंग नियमन का वह प्रावधान है जिसके तहत विदेशी मुद्रा के जोखिम वाले लेनदेन पर बैंकों को निर्धारित अनुपात में रिजर्व रखना पड़ता है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव से बैंकों की सुरक्षा करना है। सीए क्लब इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार RBI ने 16 अक्टूबर 2026 को अधिकृत डीलर बैंकों के लिए इन नियमों का स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें फॉरेक्स डेरिवेटिव, 20% रिजर्व की जरूरत, 2 मिलियन डॉलर की सीमा, छूट और रिपोर्टिंग की समय-सीमा शामिल हैं।
किन पर लागू होता है
यह नियम मुख्य रूप से अधिकृत डीलर बैंकों यानी विदेशी मुद्रा का कारोबार करने वाले बैंकों पर लागू होता है। आम ग्राहक, जैसे वेतनभोगी या छोटे दुकानदार, इससे सीधे प्रभावित नहीं होते। आयातक, निर्यातक और विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने वाली कंपनियों पर अप्रत्यक्ष असर हो सकता है, यदि बैंक अपने हेजिंग उत्पादों की लागत बदलें।
रिपोर्ट की सीमाएं
रिपोर्ट में 20% रिजर्व और 2 मिलियन डॉलर की सीमा का उल्लेख है, पर इसकी पूरी शर्तें, किन लेनदेनों पर लागू और छूट के प्रकार का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया। इसलिए सटीक अनुपालन के लिए RBI के आधिकारिक परिपत्र को देखना जरूरी है। हमने केवल रिपोर्ट के तथ्य लिखे हैं।
यह ऋण नियम क्यों नहीं है
पाठकों के लिए स्पष्ट करना जरूरी है कि यह नियम कर्ज देने या ब्याज दरों से संबंधित नहीं है, बल्कि विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव पर जोखिम प्रबंधन का है। रेपो रेट बढ़ने से जो ऋण महंगे हुए हैं, उसका संबंध इस स्पष्टीकरण से नहीं है। पर वित्तीय क्षेत्र की खबरों की श्रेणी में इसे जानकारी के रूप में रखा गया है।
रुपये के उतार-चढ़ाव के संदर्भ में
हाल के दिनों में रुपया डॉलर के मुकाबले अस्थिर रहा है। 13 अक्टूबर की हमारी रिपोर्ट में बताया गया था कि RBI के उपायों से रुपया लगभग 1% मजबूत होकर 95.78 पर पहुंचा, जबकि शुक्रवार को वह 96.73 पर था। ऐसे माहौल में विदेशी मुद्रा नियमों के स्पष्टीकरण का महत्व बैंकों के लिए अधिक हो जाता है।
आयात-निर्यात करने वाले छोटे कारोबारी क्या करें
अपने बैंक से पूछें कि फॉरेक्स फॉरवर्ड या ऑप्शन की लागत में कोई बदलाव होगा या नहीं। भुगतान के अनुबंध में मुद्रा के जोखिम की शर्तें देखें। यदि आप डॉलर में भुगतान करते या प्राप्त करते हैं तो नकदी प्रवाह की योजना उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखकर बनाएं। हेजिंग के निर्णय अपने सीए या बैंक के विशेषज्ञ से सलाह लेकर करें।
निवेशकों और आम नागरिकों के लिए
यह स्पष्टीकरण बैंकिंग प्रणाली के लिए है और इससे आम निवेशक के लिए कोई तत्काल कार्रवाई की जरूरत नहीं है। फिर भी वित्तीय बाजार की हलचल पर नजर रखना उपयोगी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
किसने जारी किया? भारतीय रिजर्व बैंक ने।
क्या यह ऋण नियम है? नहीं, यह विदेशी मुद्रा नियमन है।
आम ग्राहक पर असर? सीधा नहीं।
स्रोत: सीए क्लब इंडिया (16 अक्टूबर 2026)।


