RBI MPC October 2026 Preview: क्या 7 अक्टूबर को बढ़ेगी रेपो दर? EMI और बाजार पर असर
RBI MPC October 2026 Preview: रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की तीन दिवसीय बैठक आज, 5 अक्टूबर से शुरू हो रही है और गवर्नर संजय मल्होत्रा 7 अक्टूबर को नीति घोषणा करेंगे। रेपो दर फिलहाल 5.25% पर है। बाजार की सबसे बड़ी जिज्ञासा यही है कि क्या रिजर्व बैंक बढ़ती महँगाई, कमजोर रुपये और ऊँचे कच्चे तेल के बीच दर बढ़ाने का कदम उठाएगा। अपस्टॉक्स की रिपोर्ट के अनुसार एसबीआई रिसर्च ने 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी की संभावना जताई है।
नीति से पहले की पृष्ठभूमि
रिजर्व बैंक ने 2025 में दरें घटाई थीं और उसके बाद लंबे समय तक उन्हें स्थिर रखा। पर हालात अब बदले दिख रहे हैं। अगस्त 2026 में खुदरा महँगाई बढ़कर 4.82% हो गई थी, जबकि ब्रेंट कच्चा तेल $100 के ऊपर चल रहा है और रुपया डॉलर के मुकाबले 95-96 के आसपास है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास जहाजों पर हमलों ने तेल आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है।
इसके साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर दबाव बनाया है। जब रुपया कमजोर होता है तो आयातित वस्तुएँ महँगी हो जाती हैं, जिससे महँगाई और बढ़ सकती है। यही कारण है कि कई विश्लेषक मानते हैं कि केंद्रीय बैंक के पास सख्ती की ओर झुकने के कारण मौजूद हैं, हालाँकि वृद्धि को नुकसान पहुँचाने का जोखिम भी है।
रेपो दर बढ़ने पर क्या होता है
रेपो दर वह दर है जिस पर रिजर्व बैंक बैंकों को अल्पकालिक कर्ज देता है। जब यह बढ़ती है तो बैंकों के लिए धन की लागत बढ़ जाती है, और वे अपनी ऋण दरें बढ़ा सकते हैं। रेपो-लिंक्ड (फ्लोटिंग) होम लोन पर ईएमआई या कर्ज की अवधि बढ़ सकती है। वहीं बचतकर्ताओं को सावधि जमा पर अधिक ब्याज मिलने की उम्मीद बन सकती है, पर यह बैंकों के निर्णय पर निर्भर करता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर किसी होम लोन की ब्याज दर 7.50% से 25 आधार अंक बढ़कर 7.75% होती है तो 20 साल के ₹30 लाख के कर्ज की ईएमआई लगभग ₹24,168 से बढ़कर करीब ₹24,628 हो सकती है, यानी मासिक करीब ₹460 की वृद्धि। यह एक सामान्य गणना है; वास्तविक असर बैंक की नीति पर निर्भर करेगा।
बाजार और अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
दर वृद्धि की संभावना से बाजार पहले से सतर्क है। बैंक, एनबीएफसी, रियल एस्टेट और ऑटो जैसे ब्याज-संवेदी क्षेत्रों में नीति के दिन उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। मजबूत वृद्धि दर की उम्मीदों के बीच केंद्रीय बैंक के लिए चुनौती है कि महँगाई को काबू में रखे और साथ ही आर्थिक गति को न रोके। इसलिए नीति के बयान की भाषा, यानी रुख “तटस्थ” रहता है या “सख्ती की ओर”, उतनी ही महत्वपूर्ण होगी जितना दर का फैसला।
बाजार यह भी देखेगा कि रिजर्व बैंक अपनी वृद्धि और महँगाई के अनुमान में क्या बदलाव करता है। अगर महँगाई के अनुमान बढ़ाए गए तो इसका अर्थ होगा कि आगे भी सख्ती की गुंजाइश बनी रह सकती है। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये को सहारा देने के कदमों और तरलता प्रबंधन पर भी घोषणाएँ संभव हैं।
आम आदमी के लिए तैयारी
जिन लोगों के पास फ्लोटिंग रेट होम लोन है, वे अपनी ईएमआई में संभावित बढ़ोतरी के लिए बजट में थोड़ी गुंजाइश रखें। अगर संभव हो तो ऋण का कुछ हिस्सा पहले चुकाने (प्री-पेमेंट) या कर्ज की अवधि घटाने पर विचार करें। नए कर्ज लेने की योजना है तो विभिन्न बैंकों की दरों, प्रोसेसिंग शुल्क और शर्तों की तुलना कर लें।
बचतकर्ता एफडी की दरों पर नजर रखें और लंबी अवधि की एफडी तुरंत करने की बजाय दरें स्पष्ट होने का इंतजार कर सकते हैं। निवेशक अपने पोर्टफोलियो में ब्याज-संवेदी क्षेत्रों का अनुपात देखें और जोखिम नियंत्रित रखें। नीति के बाद बाजार में तेज चाल संभव है, इसलिए घबराहट में फैसला न लें।
पिछली नीतियों से सबक
रिजर्व बैंक के पिछले चक्र को देखें तो 2022-23 में दरें बढ़ाने का दौर चला था, जब महँगाई को काबू करने के लिए रेपो दर में कई बार वृद्धि की गई थी। फरवरी 2023 के बाद से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, फिर 2025 में कटौतियाँ आईं और लंबा ठहराव रहा। इस पृष्ठभूमि में किसी भी वृद्धि को बाजार “नीति मोड़” के रूप में पढ़ेगा, यानी रुख में बदलाव का संकेत। यही कारण है कि नीति के बयान पर इतनी बारीकी से नजर रहेगी।
पिछले चक्रों में देखा गया है कि नीति दर बढ़ने के बाद सभी बैंक एकदम से ऋण दरें नहीं बढ़ाते, लेकिन जिन ऋणों की दर रेपो से सीधे जुड़ी है उनमें बदलाव अगले रीसेट की तारीख पर दिखता है। इसलिए उपभोक्ताओं को अपने ऋण अनुबंध में रीसेट की तारीख और नियम जरूर पढ़ने चाहिए।
व्यवसायों के लिए कार्यशील पूँजी ऋण (CC/OD) की दरें भी बाहरी बेंचमार्क से जुड़ी होती हैं, जिससे उनकी ब्याज लागत में बढ़ोतरी हो सकती है। इसलिए छोटे उद्यमी अपने नकदी प्रवाह का अनुमान अभी से अपडेट कर लें और भुगतान संग्रह की गति बढ़ाने पर ध्यान दें।
स्रोत: अपस्टॉक्स की अक्टूबर 2026 रिपोर्ट, फ्री प्रेस जर्नल की गणना सामग्री तथा आरबीआई नीति कार्यक्रम। यह लेख पूर्वानुमान पर आधारित है; वास्तविक फैसला रिजर्व बैंक की घोषणा पर निर्भर करेगा। निवेश सलाह नहीं।


