विदेशी निवेशकों की भारतीय शेयर बाजार से दूरी: AI बूम की वजह से भारी निकासी
वैश्विक निवेशक भारतीय शेयर बाजार को लेकर सतर्क होते जा रहे हैं। एक तरफ ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे बाजार AI बूम की वजह से विदेशी पूंजी खींच रहे हैं, तो दूसरी तरफ भारत में कमजोर कमाई, महंगे वैल्यूएशन और कमजोर रुपये जैसी वजहों से विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार पैसा निकाल रहे हैं।
निकासी क्यों हो रही है
इस साल अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 25 अरब डॉलर की शुद्ध निकासी की है, जिससे NSE-लिस्टेड कंपनियों में विदेशी हिस्सेदारी 17 साल के सबसे निचले स्तर पर आ गई है। एक बड़ी वेल्थ मैनेजमेंट फर्म के मुताबिक उसके करीब 30% क्लाइंट्स भारत से पूरी तरह बाहर निकल चुके हैं। जानकारों का कहना है कि भारत के पास फिलहाल ताइवान और कोरिया जैसी मजबूत AI इन्वेस्टमेंट स्टोरी नहीं है, जबकि कॉर्पोरेट कमाई की ग्रोथ भी उम्मीद के मुताबिक नहीं रही।
वैल्यूएशन और करेंसी का दबाव
निफ्टी 50 फिलहाल आगामी कमाई के 17.6 गुने पर कारोबार कर रहा है, जो इमर्जिंग मार्केट बेंचमार्क की तुलना में करीब 77% ज्यादा महंगा है। इसके अलावा ऊंची तेल कीमतें और रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुका रुपया भी विदेशी निवेशकों के रिटर्न को कम कर रहा है और कंपनियों के मार्जिन पर सवाल खड़े कर रहा है।
पैसा कहां जा रहा है
निवेशकों का पैसा अब उत्तर एशिया के AI-केंद्रित बाजारों, खासकर ताइवान और दक्षिण कोरिया की ओर मुड़ रहा है, जहां बेहतर रिटर्न मिल रहा है। MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में भारत का वेटेज सालाना आधार पर 16% से घटकर 11% रह गया है।
आगे का नजरिया मिला-जुला
कई वेल्थ मैनेजर्स ने भारत को “अंडरवेट” या पूरी तरह बाहर कर दिया है क्योंकि टेक फोकस कहीं और शिफ्ट हो गया है। हालांकि मॉर्गन स्टैनली जैसी बड़ी फर्म का मानना है कि आने वाली कई तिमाहियों में भारत में ग्रोथ अपसाइकल शुरू हो सकता है — उसके बेस केस में सेंसेक्स जून 2027 तक 89,000 तक जा सकता है, जबकि बुल केस में यह 100,000 के स्तर तक पहुंच सकता है, क्योंकि मौजूदा वैल्यूएशन सपोर्टिव नजर आ रहे हैं। फिलहाल निफ्टी 50 मध्य-2024 के स्तर के आसपास ही अटका हुआ है, और यह दशक भर से चली आ रही सालाना बढ़त की लकीर को तोड़ने की कगार पर है।
छोटे निवेशकों के लिए मतलब
विदेशी निवेशकों की निकासी का मतलब यह नहीं कि घरेलू बाजार में मौका खत्म हो गया है। घरेलू म्यूचुअल फंड्स और खुदरा निवेशकों का लगातार निवेश (SIP के जरिए) बाजार को सहारा दे रहा है। जानकारों की सलाह है कि छोटे निवेशक शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव पर घबराने के बजाय लंबी अवधि के नजरिए से क्वालिटी स्टॉक्स और डाइवर्सिफाइड फंड्स में निवेश जारी रखें, और अपने पोर्टफोलियो को नियमित तौर पर रिव्यू करते रहें।
AI बूम और निवेशकों की प्राथमिकता में बदलाव
वैश्विक स्तर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों में भारी निवेश हो रहा है, विशेष रूप से अमेरिकी टेक कंपनियों के शेयरों में, जिससे विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर इन उच्च-विकास वाली AI कंपनियों में लगा रहे हैं। इसका सीधा असर भारत सहित अन्य उभरते बाजारों से पूंजी बहिर्वाह (outflow) के रूप में देखा जा रहा है।
भारतीय बाजार के लिए इसका क्या मतलब है?
हालांकि FII की बिकवाली से अल्पकालिक दबाव बनता है, लेकिन घरेलू म्यूचुअल फंड और खुदरा निवेशकों का लगातार बढ़ता निवेश इस कमी की काफी हद तक भरपाई कर रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि जैसे ही वैश्विक AI बाजार में स्थिरता आएगी, विदेशी निवेशक फिर से भारत जैसे मजबूत बुनियादी सिद्धांतों (fundamentals) वाले बाजारों की ओर रुख कर सकते हैं।


